मुंबई: राइट टू एजुकेशन (आरटीई) एक्ट के तहत 25 प्रतिशत आरक्षण की प्रवेश प्रक्रिया को लेकर राज्य में विवाद पैदा हो गया है। 12 फरवरी 2026 को जारी सरकारी फैसले के बाद 17 फरवरी से प्रवेश प्रक्रिया शुरू की गई, लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं, सिविल सोसाइटी संगठनों और अभिभावकों के समूहों ने नए दिशा-निर्देशों पर कड़ा विरोध जताया है।
मूवमेंट फ़ॉर पीस एंड जस्टिस फ़ॉर वेलफेयर (एम.पी.जे.) ने आरोप लगाया है कि हालिया आदेश में स्कूल चयन के लिए 1 किलोमीटर की दूरी की शर्त लागू कर दी गई है, जिससे आर्थिक रूप से कमज़ोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए निजी स्कूलों के विकल्प सीमित हो गए हैं। इसके अलावा, नए सर्कुलर के अनुसार प्रवेश लेने वाले बच्चों के दस्तावेज़ों की जांच का अधिकार सीधे निजी ग़ैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को दे दिया गया है, जिससे पारदर्शिता पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
ग़ौरतलब है कि पहले दस्तावेज़ों के सत्यापन (वेरिफिकेशन) के लिए ग्रुप एजुकेशन ऑफिसर की अध्यक्षता में लगभग 20 सदस्यीय स्वतंत्र समिति गठित की जाती थी, जिसमें शिक्षक, अभिभावक प्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और प्रशासनिक अधिकारी शामिल होते थे। समिति के सत्यापन के बाद स्कूल प्रवेश से इनकार नहीं कर सकते थे, जिससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी मानी जाती थी। नए नियमों में इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है।
संगठन ने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस को ज्ञापन सौंपते हुए दूरी पर आधारित पाबंदी को तत्काल ख़त्म करने की मांग की है। ज्ञापन में कहा गया है कि आरटीई एक्ट की धारा 12(1)(c) के अनुसार निजी ग़ैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए प्रवेश स्तर पर कम से कम 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमज़ोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित रखना क़ानूनी रूप से अनिवार्य है।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि आरटीई क़ानून में “पड़ोस” (नेबरहुड) के लिए 1 या 3 किलोमीटर जैसी कोई निश्चित सीमा तय नहीं है, जबकि हालिया अधिसूचना में 1 किलोमीटर का मानक लागू किया गया है। संगठन का कहना है कि बॉम्बे हाई कोर्ट पहले भी राज्य सरकार के दूरी आधारित प्रावधानों पर आपत्ति जता चुका है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार प्रशासनिक नियमों के जरिए कानूनी अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
संगठन ने राज्य सरकार से मांग की है कि दूरी के आधार पर प्रवेश सीमित करने वाले सभी आदेश और सर्कुलर तुरंत वापस लिए जाएं और स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं कि कोई भी पात्र निजी स्कूल केवल दूरी के आधार पर आरटीई प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाएगा।
एम.पी.जे. के प्रवक्ता ने कहा कि यदि मौजूदा नियम बरक़रार रहे तो हजारों बच्चों का शिक्षा का अधिकार प्रभावित हो सकता है। आपको बता दें कि मामला अब केवल प्रवेश प्रक्रिया का नहीं बल्कि आरटीई के मूल उद्देश्य यानी वंचित और ग़रीब बच्चों को समान शिक्षा अवसर दिलाने के अधिकार से जुड़ा माना जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार की अगली कार्रवाई पर हज़ारों छात्रों और उनके अभिभावकों की निगाहें टिकी हैं।

